खेलते-खेलते मौत! नाले के गड्ढे बने कब्र, सिस्टम कटघरे में

भोजराज नावानी
भोजराज नावानी

नांदेड़ में बच्चे खेल रहे थे…उन्हें क्या पता था कि जमीन के नीचे मौत छिपी बैठी है। और कुछ ही मिनटों में… खेल का मैदान कब्रगाह बन गया। ये सिर्फ एक हादसा नहीं है…ये उस सिस्टम का चेहरा है जो हर बार “लापरवाही” के पीछे छिप जाता है। और इस बार कीमत चुकाई है चार मासूम जिंदगियों ने।

लापरवाही का गड्ढा: जहां मौत इंतजार कर रही थी

Nanded के देगलूर नाका इलाके में नाले का निर्माण चल रहा था। गहरे गड्ढे खोदे गए… लेकिन सुरक्षा के नाम पर शून्य। न बैरिकेडिंग। न चेतावनी बोर्ड। न कोई निगरानी। पानी उन गड्ढों में भर गया…और वही पानी एक खामोश हत्यारा बन गया। जब सिस्टम सोता है… तो गड्ढे भी मौत बन जाते हैं।

खेल से कब्र तक: कुछ मिनटों की कहानी

गुरुवार दोपहर करीब 12 बजे…कुछ बच्चे वहीं खेल रहे थे। उन्हें क्या पता था कि पानी की सतह के नीचे कितनी गहराई छिपी है। एक बच्चा फिसला… फिर दूसरा… और देखते ही देखते चारों बच्चे उस गड्ढे में समा गए। स्थानीय लोग दौड़े… चीख-पुकार मची…लेकिन जब तक मदद पहुंची, बहुत देर हो चुकी थी। मौत ने यहां कोई आवाज नहीं की… बस चुपचाप अपना काम कर गई।

मासूम नाम, अधूरी कहानियां

इस हादसे में 10 साल के मोहम्मद अदनान, 13 साल के मोहम्मद अली, और सैयद इरफान जैसे मासूम बच्चों की जान चली गई। एक चौथे बच्चे की पहचान अभी बाकी है… लेकिन दर्द पूरा है, अधूरा नहीं। ये सिर्फ नाम नहीं हैं…ये वो कहानियां हैं जो अब कभी पूरी नहीं होंगी। आंकड़ों में चार मौतें… लेकिन घरों में चार दुनिया उजड़ गईं।

जनता का गुस्सा: “ये हादसा नहीं, हत्या है”

घटना के बाद इलाके में गुस्सा फूट पड़ा। लोगों ने नगर निगम और ठेकेदार पर सीधा आरोप लगाया— “ये हादसा नहीं, लापरवाही से हुई हत्या है।”

रिहायशी इलाके में खुले गड्ढे छोड़ना…क्या ये सीधे-सीधे लोगों की जान से खेलना नहीं? जब जिम्मेदार लोग जिम्मेदारी छोड़ दें… तो हादसे अपराध बन जाते हैं।

सिस्टम की परीक्षा: जांच या लीपापोती?

पुलिस ने जांच शुरू कर दी है। शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है। लेकिन सवाल वही है— क्या ये जांच सच तक पहुंचेगी? या फिर कुछ दिनों में ये मामला भी “फाइलों” में दफन हो जाएगा? भारत में हादसे अक्सर सुर्खियां बनते हैं…और फिर धीरे-धीरे यादों से मिट जाते हैं। यहां न्याय की रफ्तार… अक्सर हादसों की रफ्तार से धीमी होती है।

हर बार हादसे के बाद वही बयान— “कड़ी कार्रवाई होगी”, “जांच के आदेश दिए गए हैं” लेकिन जमीन पर क्या बदलता है? क्या अगली बार ऐसे गड्ढे फिर खुलेंगे? क्या फिर कोई बच्चा उसी तरह शिकार बनेगा? अगर सिस्टम नहीं बदला… तो ये हादसा आखिरी नहीं होगा।

नांदेड़ की ये घटना सिर्फ एक खबर नहीं है…ये एक चेतावनी है। अगर अब भी जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई…तो हर शहर में ऐसे “मौत के गड्ढे” तैयार होते रहेंगे। और हर बार…कुछ मासूम जिंदगियां यूं ही खत्म होती रहेंगी। बच्चों की मौत हादसा नहीं होती… वो सिस्टम की सबसे बड़ी असफलता होती है।

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